2. लूज़ शंटिंग (Loose Shunting)
लूज़ शंटिंग (Loose Shunting) शंटिंग की ऐसी विधि है जिसमें इंजन किसी वैगन अथवा वैगनों को नियंत्रित गति प्रदान करने के बाद उनसे अलग (Uncouple) हो जाता है तथा वैगन अपनी संचित गति (Momentum) के कारण निर्धारित लाइन की ओर आगे बढ़ते रहते हैं। निर्धारित स्थान पर पहुँचने के पश्चात् उनकी गति को हैंड ब्रेक, स्किड (Skid), व्हील स्कॉच अथवा अन्य स्वीकृत साधनों द्वारा नियंत्रित कर सुरक्षित रूप से रोका जाता है।
यह विधि सामान्य शंटिंग की अपेक्षा अधिक जोखिमपूर्ण मानी जाती है क्योंकि वाहन कुछ दूरी तक इंजन के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर रहते हैं। यदि गति अधिक हो जाए, पॉइंट सही स्थिति में न हों, ब्रेक समय पर न लगाया जाए अथवा कर्मचारी से किसी प्रकार की त्रुटि हो जाए, तो टक्कर (Collision), पटरी से उतरने (Derailment) अथवा माल एवं संपत्ति की क्षति की संभावना बढ़ जाती है।
इसी कारण भारतीय रेल में लूज़ शंटिंग को सामान्य कार्यप्रणाली नहीं माना गया है। जहाँ नियंत्रित Push and Pull Shunting द्वारा कार्य किया जा सकता हो, वहाँ उसी को प्राथमिकता दी जाती है। लूज़ शंटिंग केवल उन्हीं परिस्थितियों में की जाती है जहाँ यह सुरक्षित, आवश्यक तथा संबंधित नियमों के अंतर्गत अनुमत हो।
लूज़ शंटिंग का सिद्धांत
लूज़ शंटिंग का आधार जड़त्व (Momentum) है। इंजन द्वारा प्रदान की गई गति के कारण वाहन आगे बढ़ते हैं। इस अवधि में इंजन वाहन को न तो धक्का दे रहा होता है और न ही खींच रहा होता है। अतः वाहन की दिशा, गति तथा नियंत्रण पूर्णतः पहले से की गई तैयारी और शंटिंग स्टाफ की सतर्कता पर निर्भर करता है।
इसी कारण लूज़ शंटिंग प्रारम्भ करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि—
- जिस लाइन पर वाहन भेजा जाना है वह पूरी तरह खाली हो।
- संबंधित पॉइंट सही दिशा में सेट एवं लॉक हों।
- आगे कोई बाधा न हो।
- वाहन को सुरक्षित रूप से रोकने की व्यवस्था उपलब्ध हो।
- शंटिंग स्टाफ अपने-अपने स्थान पर तैनात हो।
यदि इन शर्तों में से किसी एक का भी पालन नहीं हो सकता, तो लूज़ शंटिंग नहीं की जानी चाहिए।
लूज़ शंटिंग की चरणबद्ध प्रक्रिया
लूज़ शंटिंग प्रारम्भ करने से पहले संबंधित कर्मचारी निर्धारित लाइन की जाँच करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। पॉइंट्स की स्थिति का निरीक्षण किया जाता है और आवश्यकता होने पर उन्हें लॉक कर दिया जाता है।
इसके बाद इंजन संबंधित वैगनों को नियंत्रित गति से आगे बढ़ाता है। जब वाहन पर्याप्त गति प्राप्त कर लेते हैं, तब निर्धारित स्थान पर कपलिंग (Coupling) खोली जाती है और इंजन अलग हो जाता है। इंजन के अलग होने के पश्चात् वैगन अपनी संचित गति के कारण आगे बढ़ते रहते हैं।
इस अवधि में शंटिंग स्टाफ लगातार वाहन की गति पर निगरानी रखता है। यदि आवश्यक हो तो हैंड ब्रेक, स्किड अथवा अन्य स्वीकृत साधनों का उपयोग करके वाहन की गति कम की जाती है और निर्धारित स्थान पर सुरक्षित रूप से रोका जाता है। वाहन रुकने के पश्चात् उसे आवश्यकतानुसार हैंड ब्रेक एवं अन्य सुरक्षा साधनों द्वारा सुरक्षित कर दिया जाता है।
यद्यपि यह प्रक्रिया देखने में सरल प्रतीत होती है, किन्तु वास्तविक परिचालन में इसमें अत्यधिक अनुभव, समन्वय एवं सतर्कता की आवश्यकता होती है।
लूज़ शंटिंग की अनुमति कब दी जाती है
भारतीय रेल में लूज़ शंटिंग केवल उन परिस्थितियों में की जाती है जहाँ—
- यार्ड की संरचना इसके लिए उपयुक्त हो।
- पर्याप्त नियंत्रण उपलब्ध हो।
- संबंधित नियम इसकी अनुमति देते हों।
- सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ता हो।
जहाँ नियंत्रित शंटिंग द्वारा कार्य किया जा सकता है, वहाँ लूज़ शंटिंग से बचा जाता है।
लूज़ शंटिंग किन वाहनों पर निषिद्ध है
सुरक्षा की दृष्टि से कुछ प्रकार के वाहनों पर लूज़ शंटिंग पूर्णतः प्रतिबंधित होती है। ऐसे वाहनों में सामान्यतः निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं—
- यात्री कोच (खाली अथवा भरे हुए)
- जीवित पशुओं से लदे वैगन
- सभी प्रकार के टैंक वैगन
- विस्फोटक, ज्वलनशील अथवा अन्य खतरनाक पदार्थों से लदे वैगन
- भारी मशीनरी अथवा संवेदनशील उपकरणों से लदे वैगन
- ओवर डाइमेंशनल कंसाइनमेंट (ODC) वाले वैगन
- रेलवे क्रेन
- क्षतिग्रस्त (Damaged) वाहन
- ऐसे सभी वाहन जिन पर "Not to be Loose Shunted" अंकित हो।
इन वाहनों पर प्रतिबंध का कारण केवल नियम नहीं, बल्कि सुरक्षा है। उदाहरण के लिए यदि किसी टैंक वैगन को तेज झटका लगे तो उससे रिसाव हो सकता है। विस्फोटक सामग्री वाले वैगन में गंभीर दुर्घटना हो सकती है। यात्री कोच में बैठे यात्रियों को चोट पहुँच सकती है तथा ODC वाले वैगन में लदा माल असंतुलित होकर क्षतिग्रस्त हो सकता है।
लूज़ शंटिंग के समय अपनाई जाने वाली सावधानियाँ
लूज़ शंटिंग प्रारम्भ करने से पहले संबंधित कर्मचारी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी पॉइंट सही स्थिति में हैं तथा संबंधित लाइन पूरी तरह खाली है। वाहन को नियंत्रित गति से ही छोड़ा जाना चाहिए। आवश्यकता से अधिक गति आगे चलकर नियंत्रित नहीं की जा सकती।
ब्रेक लगाने वाले कर्मचारी (जहाँ व्यवस्था हो) को पहले से निर्धारित स्थान पर तैनात रहना चाहिए। वाहन रुकने के बाद उसे तुरंत सुरक्षित किया जाना चाहिए ताकि वह पुनः गति न कर सके।
वर्षा, कोहरा, कम दृश्यता अथवा ढाल वाले स्थानों पर विशेष सावधानी आवश्यक होती है। यदि परिस्थितियाँ सुरक्षित न हों तो लूज़ शंटिंग स्थगित कर दी जानी चाहिए।
लूज़ शंटिंग के लाभ
जहाँ परिस्थितियाँ अनुकूल हों, वहाँ लूज़ शंटिंग द्वारा यार्ड में वैगनों का वर्गीकरण अपेक्षाकृत कम समय में किया जा सकता है। इंजन का उपयोग कम दूरी तक करना पड़ता है, जिससे कुछ परिस्थितियों में परिचालन क्षमता बढ़ सकती है।
लूज़ शंटिंग की सीमाएँ
यद्यपि यह विधि समय की बचत कर सकती है, किन्तु इसमें सुरक्षा जोखिम अधिक रहता है। वाहन कुछ समय तक इंजन के नियंत्रण से बाहर रहते हैं, जिससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण आधुनिक भारतीय रेल में इसका उपयोग सीमित परिस्थितियों तक ही रखा गया है तथा नियंत्रित Push and Pull Shunting को प्राथमिकता दी जाती है।
व्यावहारिक दृष्टिकोण
अनुभवी परिचालन अधिकारी सामान्यतः तभी लूज़ शंटिंग की अनुमति देते हैं जब उन्हें पूर्ण विश्वास हो कि संबंधित यार्ड की संरचना, कर्मचारियों का अनुभव तथा उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था इस कार्य के लिए पर्याप्त है। केवल समय बचाने के उद्देश्य से लूज़ शंटिंग करना उचित नहीं माना जाता। रेलवे सुरक्षा का मूल सिद्धांत है कि परिचालन की गति से अधिक महत्वपूर्ण सुरक्षा है।

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